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सूरदास

(ncert solutions for class 10 hindi kshitij chapter 1)
काव्य खंड
हृदय सिंधु मति सीप समाना। 
स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।
जो बरषइ बर बारि विचारू।
होंहि कवित मुक्तामनि चारू।।
                    – तुलसीदास
1857 जंग-ए-आज़ादी के शहीदों को सलाम

सन् 1857 के बागी सैनिकों का कौमी गीत 
हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा 
पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा 
ये है हमारी मिल्कियत हिंदुस्तान हमारा 
इसकी रूहानियत से रोशन है जग सारा 
कितनी कदीम कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा 
करती है जरखेज़ जिसे गंगो-जमुन की धारा 
ऊपर बर्फीला पर्वत पहरेदार हमारा 
नीचे साहिल पर बजता, सागर का नक्कारा 
इसकी खाने उगल रहीं सोना हीरा पारा 
इसकी शान-शौकत का दुनिया में जयकारा 
आया फिरंगी दूर से ऐसा मंतर मारा 
लूटा दोनों हाथ से प्यारा वतन हमारा 
आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा 
तोड़ो गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा 
हिंदू मुसलमां सिख हमारा भाई भाई प्यारा 
यह है आजादी का झंडा इसे सलाम हमारा।।
सरदास का जन्म सन् 1478 में माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार उनका जन्म मथुरा के निकट रुनकता या रेणुका क्षेत्र में हुआ जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार उनका जन्म-स्थान दिल्ली के पास सीही माना जाता है। 
महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य सूरदास अष्टछाप के कवियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। वे मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहते थे और श्रीनाथ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे। सन् 1583 में पारसौली में उनका निधन हुआ।
उनके तीन ग्रंथों सूरसागर, साहित्य लहरी और सूर सारावली में सूरसागर ही सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ। खेती और पशुपालन वाले भारतीय समाज का दैनिक अंतरंग चित्र और मनुष्य की स्वाभाविक वृत्तियों का चित्रण सर की कविता में मिलता है। सूर ‘वात्सल्य’ और ‘शृंगार’ के श्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। कृष्ण और गोपियों का प्रेम सहज मानवीय प्रेम की प्रतिष्ठा करता है। सूर ने मानव प्रेम की गौरवगाथा के माध्यम से सामान्य मनुष्यों को हीनता बोध से मुक्त किया, उनमें जीने की ललक पैदा की।
उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ रूप है। वह चली आ रही लोकगीतों की परंपरा की ही श्रेष्ठ कड़ी है।
यहाँ सूरसागर के भ्रमरगीत से चार पद लिए गए हैं। कृष्ण ने मथुरा जाने के बाद स्वयं न लौटकर उद्धव के जरिए गोपियों के पास संदेश भेजा था। उद्धव ने निर्गुण ब्रह्म एवं योग का उपदेश देकर गोपियों की विरह वेदना को शांत करने का प्रयास किया। गोपियाँ ज्ञान मार्ग की बजाय प्रेम मार्ग को पसंद करती थीं। 
इस कारण उन्हें उद्धव का शुष्क संदेश पसंद नहीं आया। तभी वहाँ एक भौंरा आ पहुँचा। यहीं से भ्रमरगीत का प्रारंभ होता है। गोपियों ने भ्रमर के बहाने उद्धव पर व्यंग्य बाण छोड़े। पहले पद में गोपियों की यह शिकायत वाज़िब लगती है कि यदि उद्धव कभी स्नेह के धागे से बँधे होते तो वे विरह की वेदना को अनुभूत अवश्य कर पाते। दूसरे पद में गोपियों की यह स्वीकारोक्ति कि उनके मन की अभिलाषाएँ मन में ही रह गईं, कृष्ण के प्रति उनके प्रेम की गहराई को अभिव्यक्त करती है। 
तीसरे पद में वे उद्धव की योग साधना को कड़वी ककड़ी जैसा बताकर अपने एकनिष्ठ प्रेम में दृढ़ विश्वास प्रकट करती हैं। चौथे पद में उद्धव को ताना मारती हैं कि कृष्ण ने अब राजनीति पढ़ ली है। अंत में गोपियों द्वारा उद्धव को राजधर्म (प्रजा का हित) याद दिलाया जाना सूरदास की लोकधर्मिता को दर्शाता है।
(1)
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी। 
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी। 
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी। 
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूंद न ताकौं लागी। 
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोस्यौ, दृष्टि न रूप परागी। 
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।
(2)
मन की मन ही माँझ रही। 
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही। 
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही। 
अब इन जोग सँदेसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही। 
चाहति हुती गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही। 
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।।
(3) 
हमारे हरि हारिल की लकरी। 
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी। 
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री। 
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी। 
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए. देखी सूनी न करी। 
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।।
(4)
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। 
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए। 
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए। 
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए। 
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए। 
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए। 
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए। 
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।
प्रश्न-अभ्यास
1. गोपियों द्वारा उद्धव को भाग्यवान कहने में क्या व्यंग्य निहित है? 
2. उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है? 
3. गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं? 
4. उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्नि में घी का काम कैसे किया? 
5. ‘मरजादा न लही’ के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है? 
6. कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है? 
7. गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है? 
8. प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट करें। 
9. गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए? 
10. गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं? 
11. गोपियों ने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर ज्ञानी उद्धव को परास्त कर दिया, उनके वाक्चातुर्य की विशेषताएँ लिखिए? 
12. संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए? 
रचना और अभिव्यक्ति 
13. गोपियों ने उद्धव के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए। 
14. उद्धव ज्ञानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्ति थी जो उनके वाक्चातुर्य
में मुखरित हो उठी? 
15. गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है, स्पष्ट कीजिए।
पाठेतर सक्रियता
  • प्रस्तुत पदों की सबसे बड़ी विशेषता है गोपियों की ‘वाग्विदग्धता’। आपने ऐसे और चरित्रों के बारे में पढ़ा या सुना होगा जिन्होंने अपने वाक्चातुर्य के आधार पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। जैसे-बीरबल, तेनालीराम, गोपालभाँड, मुल्ला नसीरुद्दीन आदि। अपने किसी मनपसंद चरित्र के कुछ किस्से संकलित कर एक अलबम तैयार करें। 
  • सूर रचित अपने प्रिय पदों को लय व ताल के साथ गाएँ।
शब्द-संपदा
बड़भागी – भाग्यवान
अपरस – अलिप्त, नौरस, अछूता
तगा – धागा, बंधन
पुरइनि पात – कमल का पत्ता
दागी – दाग, धब्बा
माह – में
प्रीति-नदी  – प्रेम की नदी
पाउँ  – पैर
बोस्यौ – डुबोया
परागी –  मुग्ध होना
गुर चाँटी ज्यौं पागी –  जिस प्रकार चींटी गुड़ में लिपटती है, उसी प्रकार हम भी कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं
अधार – आधार 
आवन – आगमन 
यह भी जानें

हारिल : यह पीली टाँगों वाला हरे रंग का कबूतर की जाति का पक्षी है जिसे हरियल, हारीत (संस्कृत), कॉमन ग्रीन पिजन (अंग्रेजी) भी कहा जाता है। यह पक्षी भारत में घने पेड़ों वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। ‘हारिल की लकड़ी’ लोक में मुहावरे के रूप में प्रचलित है।

तलसीदास

(chapter 2)
तलसीदास का जन्म उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर गाँव में सन् 1532 में हुआ था। कुछ विद्वान उनका जन्मस्थान सोरों (जिला-एटा) भी मानते हैं। तुलसी का बचपन बहुत संघर्षपूर्ण था। जीवन के प्रारंभिक वर्षों में ही माता-पिता से उनका बिछोह हो गया। कहा जाता है कि गुरुकृपा से उन्हें रामभक्ति का मार्ग मिला।  वे मानव-मूल्यों के उपासक कवि थे।
रामभक्ति परंपरा में तुलसी अतुलनीय हैं। रामचरितमानस कवि की अनन्य रामभक्ति और उनके सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनके राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से तुलसी ने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे उदात्त आदर्शों को प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस उत्तरी भारत की जनता के बीच बहुत लोकप्रिय है। मानस के अलावा कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर उनका समान अधिकार था। सन् 1623 में काशी में उनका देहावसान हुआ।
तुलसी ने रामचरितमानस की रचना अवधी में और विनयपत्रिका तथा कवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। उस समय प्रचलित सभी काव्य रूपों को तुलसी की रचनाओं में देखा जा सकता है। रामचरितमानस का मुख्य छंद चौपाई है तथा बीच-बीच में दोहे, सोरठे, हरिगीतिका तथा अन्य छंद पिरोए गए हैं। विनयपत्रिका की रचना गेय पदों में हुई है। कवितावली में सवैया और कवित्त छंद की छटा देखी जा सकती है। उनकी रचनाओं में प्रबंध और मुक्तक दोनों प्रकार के काव्यों का उत्कृष्ट रूप है।
यह अंश रामचरितमानस के बाल कांड से लिया गया है। सीता स्वयंवर में राम द्वारा शिव-धनुष भंग के बाद मुनि परशुराम को जब यह समाचार मिला तो वे क्रोधित होकर वहाँ आते हैं। शिव-धनुष को खंडित देखकर वे आपे से बाहर हो जाते हैं। राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने पर तथा राम की शक्ति की परीक्षा लेकर अंततः उनका गुस्सा शांत होता है। इस बीच राम, लक्ष्मण और परशुराम के बीच जो संवाद हुआ उस प्रसंग को यहाँ प्रस्तुत किया गया है। परशुराम के क्रोध भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। इस प्रसंग की विशेषता है लक्ष्मण की वीर रस से पगी व्यंग्योक्तियाँ और व्यंजना शैली की सरस अभिव्यक्ति।
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। 
आयेसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। 
सेवक सो जो करै सेवकाई। अरिकरनी करि करिअ लराई।। 
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। 
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।। 
सुनि मुनिबचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अवमाने।। 
बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई।। 
येहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार। 
धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।
लखन कहा हसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।। 
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें।। 
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू।। 
बोले चितै परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।। 
बालकु बोलि बधौं नहि तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।। 
बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकुल द्रोही।। 
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।। 
सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।। 
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।। 
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारु। चहत उड़ावन फूंकि पहारू।। 
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं ।। 
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।। 
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहौं रिस रोकी।। 
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।। 
बधे पापु अपकीरति हारें। मारतहू पा परिअ तुम्हारें।। 
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।
जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर।
सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गंभीर।। 
कौसिक सुनहु मंद येहु बालकु। कुटिलु कालबस निज कुल घालकु।। 
भानुबंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू।। 
कालकवलु होइहि छन माहीं। कहौं पुकारि खोरि मोहि नाहीं।। 
तुम्ह हटकहु जौ चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।। 
लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।। 
अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।। 
नहि संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहह।। 
बीरबती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु। 
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।। 
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।। 
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।। 
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब येहु मरनिहार भा साँचा।। 
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।। 
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगे अपराधी गुरुद्रोही।। 
उतर देत छोडौं बिनु मारे। केवल कौसिक सील तुम्हारे।। 
न त येहि काटि कुठार कठोरे। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरे।।
गाधिसूनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ। 
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।
कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।। 
माता पितहि उरिन भये नीकें। गुररिनु रहा सोचु बड़ जी कें।। 
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गये ब्याज बड़ बाढ़ा।। 
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।। 
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।। 
भृगुबर परसु देखाबहु मोही। बिप्र बिचारि बचौं नृपद्रोही।। 
मिले न कबहूँ सुभट रन गाढ़े। द्विजदेवता घरहि के बाढ़े।। 
अनुचित कहि सबु लोगु पुकारे। रघुपति सयनहि लखनु नेवारे।।
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु। 
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।
प्रश्न-अभ्यास
1. परशुराम के क्रोध करने पर लक्ष्मण ने धनुष के टूट जाने के लिए कौन-कौन से तर्क दिए? 
2. परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव
की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।
3. लक्ष्मण और परशुराम के संवाद का जो अंश आपको सबसे अच्छा लगा उसे अपने शब्दों में संवाद शैली में लिखिए। 
4. परशुराम ने अपने विषय में सभा में क्या-क्या कहा, निम्न पद्यांश के आधार पर लिखिए बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्वबिदित क्षत्रियकल द्रोही।। भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।। सहसबाहुभुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।
मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर।
गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।। 
5. लक्ष्मण ने वीर योद्धा की क्या-क्या विशेषताएँ बताईं? 
6. साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखिए। 
7. भाव स्पष्ट कीजिए
(क) बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महाभट मानी।।
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फँकि पहारू।। 
(ख) इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।।
देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।। 
(ग) गाधिसूनु कह हृदय हसि मुनिहि हरियरे सूझ।
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।। 
8. पाठ के आधार पर तुलसी के भाषा सौंदर्य पर दस पंक्तियाँ लिखिए। 
9. इस पूरे प्रसंग में व्यंग्य का अनूठा सौंदर्य है। उदाहरण के साथ स्पष्ट कीजिए। 
10. निम्नलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकार पहचान कर लिखिए
(क) बालकु बोलि बधौं नहि तोही। 
(ख) कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। 
(ग) तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा।
बार बार मोहि लागि बोलावा।। 
(घ) लखन उतर आहुति सरिस भृगुबरकोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।। 
रचना और अभिव्यक्ति 
11. “सामाजिक जीवन में क्रोध की ज़रूरत बराबर पड़ती है। यदि क्रोध न हो तो मनुष्य दूसरे के द्वारा पहुँचाए
जाने वाले बहुत से कष्टों की चिर-निवृत्ति का उपाय ही न कर सके।” 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का यह कथन इस बात की पुष्टि करता है कि क्रोध हमेशा नकारात्मक भाव लिए नहीं होता बल्कि कभी-कभी सकारात्मक भी होता है। इसके पक्ष या विपक्ष में अपना मत प्रकट
कीजिए। 
12. संकलित अंश में राम का व्यवहार विनयपूर्ण और संयत है, लक्ष्मण लगातार व्यंग्य बाणों का उपयोग करते हैं और परशुराम का व्यवहार क्रोध से भरा हुआ है। आप अपने आपको इस परिस्थिति में रखकर लिखें
कि आपका व्यवहार कैसा होता। 
13. अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए। 
14. दूसरों की क्षमताओं को कम नहीं समझना चाहिए-इस शीर्षक को ध्यान में रखते हुए एक कहानी लिखिए। 15. उन घटनाओं को याद करके लिखिए जब आपने अन्याय का प्रतिकार किया हो। 
16. अवधी भाषा आज किन-किन क्षेत्रों में बोली जाती है? पाठेतर सक्रियता
पाठेतोर सक्रियता 
  • तुलसी की अन्य रचनाएँ पुस्तकालय से लेकर पढ़ें। 
  • दोहा और चौपाई के वाचन का एक पारंपरिक ढंग है। लय सहित इनके वाचन का अभ्यास कीजिए। 
  • कभी आपको पारंपरिक रामलीला अथवा रामकथा की नाट्य प्रस्तुति देखने का अवसर मिला होगा उस अनुभव को अपने शब्दों में लिखिए। 
  • इस प्रसंग की नाट्य प्रस्तुति करें। 
  • कोही, कुलिस, उरिन, नेवारे-इन शब्दों के बारे में शब्दकोश में दी गई विभिन्न जानकारियाँ प्राप्त कीजिए।
शब्द-संपदा
भंजनिहारा – भंग करने वाला, तोड़ने वाला
रिसाइ – क्रोध करना
रिपु – शत्रु
बिलगाउ – अलग होना
अवमाने – अपमान करना
लरिकाईं – बचपन में
परसु – फरसा, कुल्हाड़ी की तरह का एक शस्त्र (यही परशुराम का प्रमुख शस्त्र था)
कोही  – क्रोधी
महिदेव – ब्राह्मण 
बिलोक – देखकर
अर्भक – बच्चा
महाभट – महान योद्धा
मही – धरती 
कुठारु – कुल्हाड़ा
कुम्हड़बतिया – बहुत कमज़ोर, निर्बल व्यक्ति, काशीफल या कुम्हड़े का बहुत छोटा फल
तरजनी – अंगूठे के पास की उँगली
कुलिस – कठोर
सरोष – क्रोध सहित
कौसिक – विश्वामित्र
भानुबंस – सूर्यवंश
निरंकुस – जिस पर किसी का दबाब न हो, मनमानी करने वाला
असंकू – शंका रहित
घालकु –  नाश करने वाला 
कालकवलु – जिसे काल ने अपना ग्रास बना लिया हो, मृत
अबुधु – नासमझ
खोरि – दोष 
हटकह – मना करने पर
अछोभा – शांत, धीर, जो घबराया न हो
बधजोगू – मारने योग्य
अकरुन – जिसमें करुणा न हो
गाभिसन – गाधि के पन यानी विश्वामित्र
अयमय – लोहे का बना हुआ
नेवारे – मना करना
ऊखमय – गन्ने से बना हुआ
कृसानु- अग्नि
यह भी जानें
दोहा – दोहा एक लोकप्रिय मात्रिक छंद है जिसकी पहली और तीसरी पंक्ति में 13-13 मात्राएँ होती हैं और दूसरी और चौथी पंक्ति में 11-11 मात्राएँ। 
चौपाई – मात्रिक छंद चौपाई चार पंक्तियों का होता है और इसकी प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ होती हैं। 
तुलसी से पहले सूफ़ी कवियों ने भी अवधी भाषा में दोहा-चौपाई छंद का प्रयोग किया है जिसमें मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत उल्लेखनीय है।
परशुराम और सहस्रबाहु की कथा
पाठ में ‘सहसबाहु सम सो रिपु मोरा’ का कई बार उल्लेख आया है। परशुराम और सहस्रबाहु के बैर की अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। महाभारत के अनुसार यह कथा इस प्रकार है परशुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे। एक बार राजा कार्तवीर्य सहस्रबाहु शिकार खेलते हुए जमदग्नि के आश्रम में आए। जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जो विशेष गाय थी, कहते हैं वह सभी कामनाएँ पूरी करती थी। 
कार्तवीर्य सहस्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय की माँग की। ऋषि द्वारा मना किए जाने पर सहस्रबाहु ने कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। इस पर क्रोधित हो परशुराम ने सहस्रबाहु का वध कर दिया। इस कार्य की ऋषि जमदग्नि ने बहुत निंदा की और परशुराम को प्रायश्चित करने को कहा। उधर सहस्रबाहु के पुत्रों ने क्रोध में आकर ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर पुनः क्रोधित होकर परशुराम ने पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने की प्रतिज्ञा की।
आदरणीय छात्रों हमने कुछ ऐसा घोषित किया है कि हमने अन्य पाठों को अपडेट नहीं किया है क्योंकि हम नहीं जानते कि क्या आपको वास्तव में इन अन्य पाठों की आवश्यकता है, यदि आप चाहते हैं तो कृपया हमें बताएं कि हम आपके उद्देश्य के लिए अन्य पाठों को अपडेट करेंगे धन्यवाद।


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Wrote by Akshay

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